अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में,बाख़ुदा कोई नहीं,
जो भी कुछ थे आप थे बस,दूसरा कोई नहीं,
कितने लम्बे रास्ते तनहा किये तय उम्र भर,
सबका इस्तक़बाल था प नाख़ुदा कोई नहीं,
सब अकेले ही उठाते अपनी वीरानी का बार,
दह्र का ये ही चलन है,बांटता कोई नहीं,
रोज़-ए-महशर सामने है और खड़े हैं रु-ब-रु,
इसकी मंजिल इन्तेहा है इब्तेदा कोई नहीं,
आह भी याहू की जौलानी सी लगती है मुझे,
इसलिए अब उससे बढ़कर या ख़ुदा कोई नहीं,
उर्मिला माधव