ये मेरे शेर और क़तआत ---
Friday, 21 November 2025
पढ़ा लिख्खा न था
तुमने उसकी शक़्ल देखी,
जिसपे लिख्खा था वजूद?
कनखियों से देख कर भी,
.........देखता कोई न था,
दिल ही दिल में मुस्कुरा के,
उसने ये सोचा के शायद,
आलिमों की भीड़ थी,
.लिख्खा-पढ़ा कोई न था,
उर्मिला माधव
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