ये मेरे शेर और क़तआत ---
Saturday, 9 April 2022
हमारे ख़ाब
हमारे ख्वाब भी तनहाई में निखरते हैं,
वगरना भीड़ में तो वक़्त गिनना पड़ता है .
उर्मिला माधव
10 .10 .2017
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