Thursday, 30 May 2024

आंखें हुईं सियाह

आँखें हुईं सियाह नहीं अपने बस में हूँ
ये ऐसा मस्सला है कि किससे क्या कहूँ
महशर की राह में हूँ मगर फ़िक्र है मुझे,
न हो ज़र्फ़ से मुख़ालफ़त ऐसी जगह रहूँ
उर्मिला माधव..
31.5.2013

महशर-----फ़ैसले का दिन
मुख़ालफ़त-----दुश्मनी

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