दो शेर
वो भी मजरूह दिल छुपाया किये,
हम भी पहुंचे नहीं दवा हो कर, पिछली गलियों को हमने छोड़ दिया, ग़र चे गुज़रे भी तो हवा हो कर,
उर्मिला माधव
9.9.2017
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