ये मेरे शेर और क़तआत ---
Thursday, 30 May 2024
आंखें हुईं सियाह
आँखें हुईं सियाह नहीं अपने बस में हूँ
ये ऐसा मस्सला है कि किससे क्या कहूँ
महशर की राह में हूँ मगर फ़िक्र है मुझे,
न हो ज़र्फ़ से मुख़ालफ़त ऐसी जगह रहूँ
उर्मिला माधव..
31.5.2013
महशर-----फ़ैसले का दिन
मुख़ालफ़त-----दुश्मनी
ग़मख़्वार होता है
कभी ऐसे ग़मों से भी जिगर दो चार होता है,
अकेले हम हैं और अपना दिल-ए-बीमार होता है,
अगर हंसने का मौसम हो ज़माना साथ हो लेगा,
कहाँ मुश्किल के लम्हों में कोई ग़म ख़्वार होता है...
#उर्मिलामाधव...
31.5.2015
Thursday, 23 May 2024
त्राहिमाम
इक ज़रा परदा हटाया, मुंह से निकला त्राहिमाम,
कारवां कुछ मुश्किलों का और अपना त्राहिमाम,
अपने एहसासों की दुनिया, दूर सबसे लेगए,
सोचते ही रह गए हम कैसे बचना त्राहिमाम,
हमने इक रस्ता निकाला ओढ़कर ख़ामोशियाँ
दिल भी करता कब तलक रोना बिलखना, त्राहिमाम,
उर्मिला माधव
Monday, 20 May 2024
शादमा
ग़म से भरी थी ज़िंदगी पर हँसके काट दी,
लोगों को ये लगा कि बहुत शादमा थे हम..
#उर्मिलामाधव
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