Saturday, 9 September 2017

हर वक़्त मुहब्बत का ...इक़रार नहीं होता ,
ख़ामोशियों का मतलब इनकार नहीं होता ,
आँखों की तरफ देखो ...जज़्बात बहुत हैं ,
अल्फ़ाज़ की बदौलत ...इज़हार नहीं होता ...
उर्मिला माधव 
30.8.2017
मुश्किलें सब ..ज़ह्न में रहती हैं,
वो भी ..घर के सह्न में रहती हैं,
चिंउटियाँ,लाल-लाल मुंह वाली,
मेरे ….....हर पैरहन में रहती हैं
........
mushkien sab zehan men rahti hain ,
Wo bhi ghar ke sahan men rahti hain,
chiuntiYan laal...........laal munh waali.
Mere .......her pairahan me rahti hain...
Urmila Madhav,
30.8.2017
चलो बस्ता समेटो अब तुम्हारी छुट्टियां होंगी,
इसी इस्कूल में पढने..नए बच्चों को आना है 

chalo bastaa sameto ab tumhari chhuttiyan hongi,
isi School men padhne naye bachchon ko aana hai....
उर्मिला माधव...
31.8.2017
मुहब्बत चुक गई है तो,....वतन के वास्ते लिख्खो,
किसी मजबूर के ग़म की चुभन के वास्ते लिख्खो,
तुम्हारे ग़म से भी बढ़कर जहां में ..सैकड़ों ग़म हैं,
अगर ये भी नहीं मुमकिन,सुख़न के वास्ते लिख्खो..
उर्मिला माधव,
31.8.2017
तन्हा ही तो होना है,
इसपे कैसा रोना है,
ताबिन्दा तक़दीर नहीं,
दिल को दरिया होना है
उर्मिला माधव
२.९.2017 
उसने दीवारें उठाईं, फ़ासले क़ायम रखे,
हमने छत सर पे उठाली,घर बचाने के लिए
उर्मिला माधव..
1.9.2017
मेरी इन ख़ामोशियों के ज़र्फ़ को मत तौलिए,
आपको अपने लिए शर्मिन्दगी हो जाएगी...

आपने जितना किया है,उतना मैं भी कर चलूँ,
वरना मेरे नाम कुल ,आवारगी हो जाएगी..
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Meri in khamoshiyon ke zarf ko mat takiye,
Aapko apne liye,sharmindagi ho jaegii......

Aapne jitna kiya hai,utna main bhi kar chalun,
Warna mere naam kul aawargi ho jayegi...
उर्मिला माधव
1.9.2017
अभी काली घटा में एक बिजली ज़ोर से चमकी,
सहर और शाम आपस में, मिली सी लग रही है,
उर्मिला माधव
ज़ख़्म ग़र ये ..बरमला हो जायेगा,
बस ख़ुदा का दर भला हो जायेगा,
ज़लज़ले ....रफ़्तार पर आ जायेंगे,
हर नफ़स एक .कर्बला हो जाएगा..
उर्मिला माधव..
2.9.2017
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Zakhm gar ye barmala ho jayega,
Bas khuda ka ghar bhala ho jayega,
Zalzale raftaar .....main aa jayenge
Har nafas ek karbalaa ho jaayegaa..
Urmila Madhav
दिल पथ्थर से,अक्सर टकरा जाता होगा,
कभी तजुर्बा,शबनम से जलने का कीजै...
उर्मिला माधव,
2.9.2017
मेरे घर में एक दिन जब ..........दर्द का आलम रहा,
आने-जाने वालों का इक...... ख़ास तबक़ा कम रहा,
चश्म-ए-गिरयां एक तरफ़ कर,बस यही सोचा फ़क़त,
अब से मैं तनहा चलूँगी,....... ग़र चे दम में दम रहा….
उर्मिला माधव,
2.9.2017
सोचता कौन है अब,रब के लिए,
मरते रहते हैं सब लक़ब के लिए,
urmila madhav
9.9.2017
हम अकेले ख़ास अपने रंग में हैं,
यूं बज़ाहिर आप सबके संग में हैं....
उर्मिला माधव..
4.9.2017

गुल बनेंगी एक दिन कलियां सभी,
फिर तो बाक़ी, वक़्त का किरदार है..
उर्मिला माधव...
3.9.2017
दो शेर
वो भी मजरूह दिल छुपाया किये,
हम भी पहुंचे नहीं दवा हो कर,

पिछली गलियों को हमने छोड़ दिया,
ग़र चे गुज़रे भी तो हवा हो कर,
उर्मिला माधव 
9.9.2017

सब लोग बहुत कुछ कहते हैं हम फ़ेक हंसी हंस देते हैं,
ढकने को अपने अश्क़ दुपट्टा आरिज़ पे रख देते हैं,
उर्मिला माधव,
7.9.2017